Ashutosh Gupta, Raebareli: उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले में जहां होली का त्योहार रंगों, उमंग और खुशियों का पर्याय माना जाता है, वहीं जिले के डलमऊ तहसील क्षेत्र के 28 गांवों में यह पर्व शोक की स्मृति बनकर रह गया है। इन गांवों में न तो रंग उड़ते हैं, न गुलाल की फुहारें होती हैं और न ही फागुन की मस्ती का कोई आलम दिखता है। सदियों से चली आ रही एक ऐतिहासिक घटना के कारण यहां होली के दिन लोग शोक मनाते हैं और इस परंपरा को आज भी निभाते हैं।
वरिष्ठ उद्मी और अग्रहरि धाम के संरक्षक रामनिवास वैश्य के अनुसार, 1321 ईस्वी में होली के दिन डलमऊ के राजा डलदेव अपने 200 सैनिकों के साथ जौनपुर के शासक शाह शर्की की सेना से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे। इस युद्ध में राजा डलदेव के साथ उनके सभी सैनिक शहीद हो गए थे, जबकि शर्की की सेना के दो हजार से अधिक सैनिक मारे गए थे। राजा डलदेव के बलिदान की स्मृति में इन 28 गांवों के लोग होली के दिन रंगों से दूर रहते हैं और तीन दिनों तक शोक मनाते हैं।

युद्ध में राजा डलदेव के बलिदान की याद में यह परंपरा सदियों से चली आ रही है। डलमऊ के निवासियों के लिए होली केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि अपने इतिहास और पूर्वजों की वीरता को याद करने का दिन भी है। हालांकि, होली के तीन दिन बाद इन गांवों में लोग रंगों का त्योहार मनाते हैं, लेकिन मुख्य होली के दिन वे रंग और गुलाल नहीं उड़ाते। यह अनूठी परंपरा डलमऊ की ऐतिहासिक विरासत को आज भी जीवंत बनाए हुए है और क्षेत्र के लोग अपने पूर्वजों के बलिदान को सम्मान देते हुए इस परंपरा का पालन करते आ रहे हैं।
होली के दिन जहां देशभर में लोग रंगों में डूबे नजर आते हैं, वहीं डलमऊ के इन गांवों में सन्नाटा पसरा रहता है। न बच्चे रंग लेकर सड़कों पर दौड़ते हैं, न ही ढोल-नगाड़ों की थाप सुनाई देती है। स्थानीय निवासी राम प्रसाद बताते हैं, “हमारे बुजुर्गों से सुना है कि होली के दिन हमारे राजा और सैनिकों ने अपनी जान दी थी। उनकी शहादत को सम्मान देने के लिए हम रंग नहीं खेलते।”
गांव की महिलाएं भी इस दिन घरों में चुपचाप रहती हैं। पकवान बनाने या उत्सव मनाने की कोई तैयारी नहीं होती। प्रदीप शुक्ला कहते हैं कि, “हमारे लिए होली का मतलब खुशी नहीं, बल्कि उस दर्द की याद है जो हमारे इतिहास का हिस्सा है।”
हालांकि, ये गांव होली को पूरी तरह से नजरअंदाज नहीं करते। परंपरा के अनुसार, होली के तीन दिन बाद अबीर-गुलाल लगाकर इस पर्व को सीमित तरीके से मनाते हैं। इस दिन हल्की-फुल्की खुशियां बांटी जाती हैं, लेकिन बड़े उत्सव से परहेज किया जाता है। यह प्रथा इन गांवों में पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है और आज भी युवा इसे निभाने में पीछे नहीं हटते।
डलमऊ तहसील के इन 28 गांवों में पखरौली, बहादुरपुर, गौसगंज, और आसपास के कई छोटे-बड़े गांव शामिल हैं। ये सभी गांव आपस में सांस्कृतिक और ऐतिहासिक रूप से जुड़े हुए हैं। यहां के लोग मानते हैं कि यह परंपरा न केवल उनके इतिहास को जीवित रखती है, बल्कि उनके समुदाय की एकता को भी मजबूत करती है।
डलमऊ नगर पंचायत के अध्यक्ष बृजेश दत्त गौर बताते हैं, “यह परंपरा एक अनोखा उदाहरण है कि कैसे कोई समुदाय अपने अतीत को सम्मान देता है। यह सिर्फ शोक की बात नहीं, बल्कि बलिदान और वीरता की गाथा है जो इन गांवों की पहचान बन गई है।”