हमारे देश की संस्कृति में होली का पर्व अत्यंत दिव्य एवं व्यावहारिक है। वैदिक नववर्ष के आगमन का यह आह्वान है कि व्यक्ति अपने समस्त मनोविकारो को दहन कर परस्पर प्रेम और सौहार्द से सम्बन्धों में आशा और उल्लास के विविधि रंगों का समावेश कर दे। होली भारतीय परंपरा में आनंद का उत्सव कहा जाए, तो गलत नहीं होगा। यह पर्व वातावरण में मौजमस्ती और हर्षोल्लास का रंग भर देता है। वसंत ऋतु की विदाई का यह त्योहार असलियत में जीवन की नीरसता दूर कर उसमें मधुरता घोल देता है। इस समय प्रकृति नई-नवेली दुल्हन की तरह खिल उठती है।
सोचिए! यदि जन्म उल्लास का आधार है, तो फिर मृत्यु शोक का कारण कैसे और क्यों हुआ? मृत्यु के कारण ही तो जन्म होता है। यदि पतझड़ में पत्ते झड़ेंगे नहीं, तो वृक्ष पर नए पत्ते आएंगे कहां से? यही है होली का तत्वदर्शन। प्रकृति का मनुष्य से गहरा संबंध है। कारण है कि जिन पंचभूतों (आकाश, पृथ्वी, पवन, अग्रि और जल) से प्रकृति बनी है, उन्हीं पंच-तत्वों से मानवी काया का सृजन हुआ है। यह बात विज्ञान भी मानता है।
प्रकृति का बदलाव मनुष्य की प्रवृत्ति को भी बदल देता है। फागुनी प्रकृति जब रंगों की छटा बिखेरती है, तो होली के विभिन्न रंग जन-जीवन में अवतरित होते हैं। जन-जीवन में ही नहीं, प्रकृति परिकर के हर क्षेत्र में महारास शुरू हो जाता है। टेसू और सेमल के गहरे लाल पीले रंग फूलों की रूपमाधुरी और उनकी सुगंध माहौल में लव्यापने लगती है, उन पर भंवरे और तितलियां मंडराते दिखाई देते हैं। खेतों में सरसों के पीले फूलों से प्रकृति भी सुंदर और मादक दिखाई देती है। सौंदर्य और मादकता का यह संगम पूरे जगत को मोहित करने लगता है। इसे हम ऋतुराग भी कहते हैं, क्योंकि नृत्य और गान के बिना होली पूरी होती ही नहीं। फिर जहां नृत्य, संगीत और गान होगा, वहां उल्लास तो होगा ही। वसंत ऋतु का मदमस्त मौसम मानव मन में सहज ही कामनाएं उद्दीप्त कर देता है। होली वस्तुत: मलिनताओं के दहन और तमस को जलाने का महाअनुष्ठान है। यह प्रेम की वह रसधारा है, जिसमें समूचा समाज एक साथ भीगकर अपने अंतस के कलुष को धोता है।
इस पर्व के राग, रंग, हंसी, ठिठोली, लय, चुहल, आनंद और मस्ती से सामाजिक विषमताएं टूटती हैं और वर्जनाओं से मुक्ति मिलती है।खेतों में सरसों के पीले फूलों से प्रकृति भी सुंदर और मादक दिखाई देती है। सौंदर्य और मादकता का यह संगम पूरे जगत को मोहित करने लगता है। इसे हम ऋतुराग भी कहते हैं, क्योंकि नृत्य और गान के बिना होली पूरी होती ही नहीं। फिर जहां नृत्य, संगीत और गान होगा, वहां उल्लास तो होगा ही। वसंत ऋतु का मदमस्त मौसम मानव मन में सहज ही कामनाएं उद्दीप्त कर देता है। होली वस्तुत: मलिनताओं के दहन और तमस को जलाने का महाअनुष्ठान है। यह प्रेम की वह रसधारा है, जिसमें समूचा समाज एक साथ भीगकर अपने अंतस के कलुष को धोता है। इस पर्व के राग, रंग, हंसी, ठिठोली, लय, चुहल, आनंद और मस्ती से सामाजिक विषमताएं टूटती हैं और वर्जनाओं से मुक्ति मिलती है।
जाति-वर्ण के भेदों को समतल करता हुआ होली का आनंदोल्लास जन-जन में प्रवाहित होता सहज ही देखा जा सकता है। प्रकृति के प्रवाह से प्रकट यह पर्व समाज के बीच ऐसा वातावरण सृजित करता है, जिसमें वर्ष भर से मनों में दबी कुंठाएं निर्बीज हो जाती हैं। पर्व की अंतर्कथा के अनुसार भक्त प्रहलाद के आह्वान पर भगवान नरसिंह के प्रकटीकरण और वरदानी होलिका के अग्नि में जलकर नष्ट हो जाने का पर्व से जुड़ा पौराणिक कथानक बताता है कि यदि उद्देश्य व भावनाएं कलुषित हों, तो ईश्वरीय वरदान भी निष्फल हो जाते हैं। होलिका दहन के इसी प्रसंग को केंद्र में रखकर हमारे वैदिक ऋषियों ने इस पर्व परंपरा का शुभारंभ किया था। यह पर्व अन्न को संस्कारित करके ग्रहण करने का महान दर्शन भी स्वयं में समेटे हुए है।
यही नहीं, हमारे तत्वदर्शी मनीषी इस तथ्य से भली भांति परिचित थे कि शीत से ग्रीष्म के ऋतु परिवर्तन की इस अवधि में चेचक और खसरा जैसे संक्रामक रोगों की आशंका रहती है। अत: इनसे बचने के लिए उन्होंने टेसू, केसर, मजीठ, नीम और पलाश आदि के फूलों के रोगाणुरोधी गुणों को परखकर उनका रंग बनाकर एक-दूसरे पर डालने की प्रथा शुरू की।
धर्मशास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि प्राचीन काल में होलिका की हवन सामग्री में भी इन औषधीय फूलों की अधिकता रखी जाती थी, ताकि वायु में उपस्थित रोग के कीटाणु नष्ट हो जाएं। अब यदि होली के रास-रंग की बात करें, तो कृष्ण की ब्रज की होली की तो बात ही निराली है। अवध में रघुवीर और काशी में शिव की मसान होली भी कम लोकप्रिय नहीं है।
फाग, होरी, धमार, रसिया, कबीर, जोगिरा, ध्रुपद और ठुमरी की गायकी सदियों से होलिकोत्सव में जीवंतता भरती आ रही है। करीब आधी सदी पूर्व तक होली कुदरत के रंगों यानी टेसू, केसर, मजीठ आदि के रंगों से खेली जाती थी, लेकिन बाजारीकरण कहें या भूमंडलीकरण के दौर में आज कुदरत के रंग न जाने कहां खो गए हैं और हम अपनी संस्कृति और सभ्यता को लगभग भुला ही बैठे हैं। अब तो इनके रंगों से होली खेलने वालों की तादाद नगण्य सी है।
ब्रह्म को सच्चिदानंद भी कहा गया है, क्योंकि वह आनंद से सदा परिपूर्ण हंै। शिव का तांडव नृत्य भले ही अधिक प्रसिद्ध है, लेकिन वे मस्ती और आनंद व्यक्त करते हैं, तो उनका नृत्य लास्य बन जाता है। लास्य अर्थात आनंद से परिपूर्ण। नृत्य स्वयं आनंद है। होली पर्व सनातन जीवन दर्शन का सक्रिय रूप है, उस आनंद की पूर्णता है। होली जितना आनंद शायद ही किसी अन्य पर्व में है। इस त्योहार में आने वाले का स्वागत होता है और जाने वाले का शोक मनाया जाता है। इस पर्व की खासियत यह है कि आने वाले के साथ-साथ जाने वाले को भी हर्षोल्लास के साथ विदा किया जाता है।
राजेन्द्र वैश्य, पर्यावरणविद् एंव अध्यक्ष, पृथ्वी संरक्षण